स्वामी विवेकानंद जयन्ती केरियर डे और राष्ट्रीय युवा दिवस कब मनाते हैं???

स्वामी विवेकानंद जयन्ती

केरियर डे अर्थात् स्वामी विवेकानंद जयन्ती अर्थात् 12 जनवरी। इस दिन स्वामी विवेकानन्द जयन्ती का आयोजन किया जाता है और इसे राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में भी जाना जाता है। (ध्यान रहें अन्तर्राष्ट्रिय युवा दिवस 12 अगस्त को मनाया जता हैं ।)

केरियर डे पर विद्यालयों में बालकों को केरियर के बारे में जानकारी दी जाती है, कि वे बारहवीं क्लास के बाद कौन-कौन से प्रोफेशनल कोर्स कर सकते हैं। और वो किस किस क्षेत्र मेें अपना केरियर बना सकते हैं। कुल मिलाकर बालकों को अपने केरियर के प्रति जागरूक करना ही केरियर डे का उददेश्य होता हैं।

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राष्ट्रीय युवा दिवस

भारत के युवाओं को प्रेरित करने में और उनको बढ़ावा देने में स्वामी विवेकानंद जी का जीवन ही सबसे महत्वपूर्ण साबित हुआ है। इसलिए ही उनकी जयंती को राष्ट्रिय युवा दिवस के रूप मे मनाया जाता हैं। वो हमेशा युवाओं को बढ़ावा देते थे और उनको कहते थे कि आप इस देश के कर्णधार हो। आप जो चाहते हो वो कर सकते हों। युवा ही वो चीज है जो हर असम्भव कार्य को सम्भव कर सकतें हैं।

युवाओं को बढ़ावा देने के लिए स्वामी विवेकानन्द के कई आदर्श शब्द आज भी प्रचलित है-

महसूस करो कि तुम महान हो और तुम महान बन जाओगें।” – स्वामी विवेकानंद

“उठो, जागो और जब तक मत रुको तब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो। ”– स्वामी विवेकानंद

स्वामी विवेकानंद जी की जीवनी :-

स्वामी विवेकानंदजी का जन्म 12 जनवरी 1863 कोलकाता में ब्रिटिश भारत की राजधानी को मकर संक्रांति पर्व के दौरान हुआ। उनके गुरु का नाम रामकृष्ण परमहंस था और वो 1 आध्यात्मिक गुरु थे। स्वामी विवेकानंदजी ने अध्यात्म की समस्त शिक्षाएं रामकृष्ण परमहंस जी से ली थी। स्वामी विवेकानंद जी के बचपन का नाम नरेन्द्र दत्त था।

वे एक पारंपरिक परिवार से थे और नौ भाई-बहनों में से एक थे । इनके पिता- विश्वनाथ दत्ता। वे कलकत्ता उच्च न्यायालय में एक वकील थे। इनके दादा- दुर्गाचरण दत्ता। वे एक संस्कृत और फ़ारसी विद्वान थे। स्वामी विवेकानन्द जी ने 25 वर्ष की उम्र में अपना परिवार छोड़ दिया और एक भिक्षु बन गए। इनकी माँ- भुवनेश्वरी देवी। जो एक समर्पित गृहिणी थीं। नरेंद्र के पिता और उनकी माँ के धार्मिक स्वभाव के प्रगतिशील, तर्कसंगत रवैये ने उनकी सोच और व्यक्तित्व को आकार देने में मदद की।

नरेंद्रनाथ कम उम्र से ही आध्यात्मिकता में रुचि रखते थे और शिव, राम, सीता, और महावीर हनुमान जैसे देवताओं की छवियों के सामने ध्यान लगाते थे। वे तपस्वियों और भिक्षुओं को भटकते हुए मोहित हो गए।

नरेन्द्र बच्चे के रूप में शरारती और बेचैन था, और उसके माता-पिता को अक्सर उसे नियंत्रित करने में कठिनाई होती थी।उनकी माँ ने कहा, “मैंने शिव से एक पुत्र के लिए प्रार्थना की और उन्होंने मुझे उनके एक राक्षस को भेज दिया”।

स्वामी विवेकानंद जी की प्रारंभिक शिक्षा

सन 1871 में, जब नरेंद्र आठ साल की उम्र का था। नरेंद्रनाथ ने ईश्वर चंद्र विद्यासागर के महानगरीय संस्थान में दाखिला लिया। इस संस्थान में वे 1877 तक स्कूल गए। 1879 में जब उनका परिवार कलकत्ता लौटा तो, उन्होँने प्रेसीडेंसी प्रवेश परीक्षा में प्रथम श्रेणी के अंक प्राप्त करें। जो कि किसी के बस की बट न थी। वे दर्शन, धर्म, इतिहास, सामाजिक विज्ञान, कला और साहित्य सहित विषयों की एक विस्तृत श्रृंखला में एक उत्साही पाठक थे। वेद, उपनिषद, भगवद गीता, रामायण, महाभारत और पुराणों सहित हिंदू शास्त्रों में भी उनकी रुचि थी। नरेंद्र को भारतीय शास्त्रीय संगीत में प्रशिक्षित किया गया था। वे नियमित रूप से शारीरिक व्यायाम, खेल और संगठित गतिविधियों में भाग लिया करतें थे।

विवेकानंद जी ने जनरल असेंबलीज़ इंस्टीट्यूशन में पश्चिमी तर्क, पश्चिमी दर्शन और यूरोपीय इतिहास का अध्ययन किया। (अब यह इंस्टीट्यूशन स्कॉटिश चर्च कॉलेज के नाम से जाना जाता है)

ग्रेजुएसन

इन्होंने 1881 में ललित कला की परीक्षा उत्तीर्ण की, और 1884 में बैचलर ऑफ आर्ट्स की डिग्री पूरी की। नरेंद्र ने डेविड ह्यूम, इमैनुएल कांट, जोहान गोटलिब फिच्ते, बरूच स्पिनोज़ा, जॉर्ज डब्ल्यू, एफहेगेल, आर्थर शोपेनहावर, अगस्टे कॉम्टे, जॉन स्टुअन मिल और चार्ल्स डार्विन के कार्यों का गहराई से अध्ययन किया। वह हर्बर्ट स्पेंसर के विकासवाद से रोमांचित हो गए और उनके साथ पत्र व्यवहार कर बातचीत की। स्पेन्सर की पुस्तक “शिक्षा ” का नरेंद्र नाथ दत्त ने बंगाली में अनुवाद किया। उन्होँने पश्चिमी दार्शनिकों का अध्ययन के साथ साथ, संस्कृत शास्त्र और बंगाली साहित्य भी सीखा।

नरेंद्र नाथ दत्त की प्रशंसा करते हुए विलियम हस्ती ने लिखा, “नरेंद्र प्रतिभाशाली हैं। मैंने बहुत दूर-दूर की यात्राएँ की हैं, लेकिन मैं कभी भी उनकी प्रतिभा और संभावनाओं के साथ जर्मन विश्वविद्यालयों में नहीं आया। दार्शनिक छात्र। वह जीवन में अपनी पहचान बनाने के लिए बाध्य हैं। ” ध्यान रहे कि विलियम हस्ती नरेन्द्र नाथ दत्त के प्रिन्सिपल थे ,जहाँ से उन्होँने कॉलेज पास की।

अमेरिका का शिकागो सम्मलेन:-

अमेरिका के शिकागो में विश्व धर्म सभा में उन्होंने भारत की तरफ से सनातन धर्म की तरफ़ से अपने विचार रखे। वहाँ पर सभी धर्मों को रिप्रजेंट करने अलग-अलग धर्मगुरु आये हुए थे। वो सब “लेडीज ऐण्ड जेंटलमेन” (एक फॉर्मल लैंग्वेज) से शुरु कर रहें थे जोकि सभी प्यार ओर सौहार्दपूर्ण लैंग्वेज नहीं थी। स्वामी विवेकानंद जी को वहां बोलने के लिए केवल 2 मिनट दिये गये थे लेकिन जैसे ही उन्होंने बोलना शुरु किया- “अमेरिका के भाईयों और बहनों “। जैसे ही ये शब्द बोले वहां स्थित सभी अमेरिकावासियों और दूसरे देश से आये सभी लोगों ने तालियों की गड़गड़ाहट शुरू कर दी और सभी बोलने लगे वाह क्या इन्सान है।

दृष्टांत :-

नरेंद्र को उनकी विलक्षण स्मृति और गति पढ़ने की क्षमता के लिए जाना जाता था। यहाँ हम कई घटनाओं को उदाहरण के माध्यम से समझने की कोशिश करेंगे।

उदहारण एक

एक बार स्वामी विवेकानंद जी को नीचा दिखाने के लिए किसी ने एक सवाल किया कि देखो ये किताबें रखी हैं उनमें सबसे नीचे गीता रखी गई है और बिल्कुल महत्वपूर्ण नहीं है जो सबसे नीचे रखी गई है, तो स्वामी विवेकानंद जी ने उनको बड़ा ही अच्छा उत्तर दिया उनको बोले कि- जो सबसे नीचे होता है वही सबका आधार होता है और अगर आधार को हटा दें तो किसी भी किताब का कोई अस्तीत्व नहीं रह जायेगा सब किताबी गिर जायेगी अर्थात जो गीता नीचे रहकर भी सबको आधार, सहारा दे रही हैं और यही गीता का ज्ञान सबके लिए आधार का कार्य कर रहा है इसीलिए गीता नीचे रखी हुए हैं फिर भी सबसे महत्वपूर्ण है।

उदहारण दो

एक समय चर्चा करते हुए उन्होंने पिकविक पेपर्स के दो या तीन पन्नों को शब्दशः लिखा था।

उदहारण तीन

एक और घटना के बारें मे जानते हैं ।एक बार स्वीडिश राष्ट्रीय के साथ उनका तर्क था। जहां पर उन्होंने स्वीडिश इतिहास के कुछ विवरणों का संदर्भ दिया था। जिसको स्वेडिश लोग मानने को तैयार नहीं थे, लेकिन बाद में मान गए।

उदहारण चार

अन्य घटना डॉ. पॉल ड्यूसेन के साथ जो जर्मनी में हूई। विवेकानंद डॉ. पॉल ड्यूसेन के साथ कुछ काव्य कृति पर जा रहे थे। चलते चलते रास्ते में जब प्रोफेसर ने उनसे कुछ बात की तो विवेकानंद जी ने कोई जवाब नहीं दिया। बाद में जब विवेकानंद जी को पता चला तो उन्होंने डॉ. ड्यूसेन से माफी माँगी। और कहा कि “मैं पढ़ने में बहुत ज्यादा लीन था इसलिए आपकी बात नहीं सुन सका”। प्रोफेसर इस स्पष्टीकरण से संतुष्ट नहीं थे। लेकिन जब विवेकानंद जी ने उन पढ़े हुए पाठो से छंदों की व्याख्या की तो प्रोफेसर देखता ही रह गया।

उदहारण पांच

एसे ही एक बार, विवेकानंद जी एक पुस्तकालय गए और वहाँ से सर जॉन लब्बॉक द्वारा लिखी गई कुछ पुस्तके लेने के लिये पुस्तकालयध्यक्ष से अनुरोध किया। अगले दिन विवेकानंद जी उन पुस्तकों को लौटाने आते हैं और पुस्तकालयध्यक्ष से कहतें हैं कि मैनें सब पढ़ ली हैं। लाइब्रेरियन को उन पर विश्वास नही हुआ। तब विवेकानंद जी ने उन पुस्तकों मे लिखी सामग्री को अच्छे तरीके से बता दिया जब जाकर पुस्तकालयध्यक्ष को विश्वास हुआ।

उद्देश्य:–

राष्ट्रीय युवा दिवस मनाने के पीछे हमारे देश का यही थी कि हमारे देश की भावी और वर्तमान युवाओं में जोश भरना और उनमें ऐसे उम्मीदें भरना कि वो असंभव से असंभव कार्य को भी संभव बना सके और कठिन परिश्रम करके देश को उच्च स्तर पर पहुंचा सके।

कुछ सवालों के जवाब कमेंट करे-

1. स्वामी विवेकानंद जी का जन्म कब हुआ?

2.स्वामी विवेकानंद जी के गुरु का नाम क्या था?

3.स्वामी विवेकानंद जी ने कोनसे मिशन की स्थापना की?

4.स्वामी विवेकानंद जी के बचपन का नाम क्या था?

5केरियर डे कब मनाया जाता हैं?

6. राष्ट्रीय युवा दिवस कब मनाया जाता है?

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